
बंदरपूँछ पर्वतमाला की गोद में स्थित यमुनोत्री, माँ यमुना को समर्पित धाम है। परंपरागत चारधाम यात्रा पश्चिम से पूर्व की ओर यहीं से आरंभ होती है। मंदिर, हिमालयी जलधारा और गरम जलकुंड मिलकर इस तीर्थ को एक आत्मीय और अनूठा स्वर देते हैं।
पुराण-परंपरा
सूर्यपुत्री यमुना और असित मुनि की कथा
धार्मिक परंपरा में यमुना को सूर्यदेव की पुत्री और यमराज की बहन माना जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा से यमुना का स्मरण और स्नान मनुष्य को मृत्यु-भय से मुक्त होने की प्रेरणा देता है। इसी कारण भाई दूज की परंपरा में भी यमुना और यम का स्नेह याद किया जाता है।
एक अन्य लोकमान्यता ऋषि असित मुनि से जुड़ी है, जो इसी क्षेत्र में तप करते थे और प्रतिदिन गंगा तथा यमुना में स्नान करते थे। वृद्धावस्था में गंगोत्री जाना कठिन हुआ तो कहा जाता है कि उनके आश्रम के निकट गंगा की एक धारा प्रकट हुई। यह कथा यमुनोत्री को तप, करुणा और दिव्य अनुग्रह के स्थल के रूप में देखती है।
धाम के पवित्र संकेत
सूर्यकुंड
मंदिर के निकट अत्यंत गरम जल का कुंड है। श्रद्धालु कपड़े में चावल या आलू बाँधकर जल में पकाते हैं और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
दिव्य शिला
मंदिर में प्रवेश से पहले दिव्य शिला के पूजन की परंपरा है। यह यात्रा के आरंभ में विनम्रता और संकल्प का प्रतीक मानी जाती है।
यात्रा का स्वर
जानकीचट्टी से आगे का पर्वतीय मार्ग पैदल, पालकी या घोड़े से पूरा किया जाता है। मौसम और प्रशासनिक निर्देश देखकर ही यात्रा करनी चाहिए।
यात्रा क्रम: यमुनोत्री → गंगोत्री → केदारनाथ → बद्रीनाथ
उत्तराखंड सरकार का आधिकारिक पोर्टल
चारधाम यात्रा की योजना और पंजीकरण
यात्रा तिथियाँ चुनें, तीर्थयात्री विवरण दर्ज करें और आधिकारिक यात्रा पंजीकरण पत्र प्राप्त करें।
पौराणिक विवरण धार्मिक परंपराओं के रूप में प्रस्तुत हैं। तथ्य-संदर्भ: जिला प्रशासन उत्तरकाशी। यात्रा से पहले वर्तमान मौसम और सरकारी निर्देश अवश्य देखें।
